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चमकौर का युद्ध | Shahidi Saptah | साहिबजादे की शहादत

चमकौर की लड़ाई

चमकौर की लड़ाई |शहीदी सप्ताह

चमकौर का युद्ध जिसे चमकौर साहिब की लड़ाई के रूप में भी जाना जाता है। चमकौर युद्ध में एक तरफ मात्र 40 सिख और दुसरे तरफ मुगलों की लाखो सेना, फिर भी सीख पीछे नहीं हटे। चमकौर का युद्ध श्री गुरु गोबिंद सिंह के नेतृत्व में सिखों और मुगलों की गठबंधन सेना के बीच लड़ी गई लड़ाई थी। इस भयानक युद्ध में श्री गुरु गोविंद साहब के साहिबजादे और सैकड़ों सिखों की शहादत हुईं थीं। गुरु गोबिंद सिंह ने अपने विजय पत्र जफरनामा में चमकौर युद्ध का उल्लेख किया है।

चमकौर की लड़ाई

5 और 6 दिसंबर, 1704 की रात को श्री गुरु गोबिंद सिंह के आनंदपुर साहिब छोड़ने के बाद, उन्होंने अपने शिष्यों के साथ सरसा नदी पार की।  जब वे पार कर रहे थे, मुगलों और पहाड़ी प्रमुखों ने हमला किया।  गुरु गोबिंद सिंह और उनके अनुयायियों ने शहर के प्रमुख से अपनी हवेली में रात को आराम करने की अनुमति मांगी। शहर प्रमुख ने मना कर दिया था लेकिन उसके छोटे भाई ने गुरु गोविंद सिंह जी को उनके पुत्रों और सिखों के साथ हवेली में रहने दिया।

सुरक्षित रहने देने के आश्वासन देने के बावजूद, मुगल सैनिक गुरु गोबिंद सिंह को उनके सिर कलम करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह जानने के बाद कि सिखों की पार्टी ने हवेली में शरण ली है, मुगलों ने उन पर घेराबंदी कर दी।  कहा जाता है कि वास्तविक लड़ाई हवेली के बाहर हुई थी जहां गुरु गोबिंद सिंह आराम कर रहे थे।  बातचीत टूट गई और सिख सैनिकों ने मुगल सेनाओं से सामना करने का फैसला किया तथा अपने गुरु को यहां से निकल जाने की इजाजत दी।  एक और सिख, जो गुरु के समान था, संगत सिंह, ने गुरु के कपड़े पहने और सैनिकों के साथ रहे।  अगली सुबह होते होते शेष सिखों को मुगल सेना ने शहीद कर डाला। इस तरह सिख सैनिकों ने अपने गुरु की जान बचाने में सफल रहे।

चमकौर युद्ध का परिणाम

चमकौर का युद्ध बहुत ही भयावह था और इसमें गुरु गोविंद सिंह के साहबजादे के साथ-साथ सिख सैनिकों की शहादत हुईं थीं। सिख योद्धा बहादुरी से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दिए थे। इस युद्ध के समय साहिबजादा अजीत सिंह जिनकी उम्र सिर्फ 18 बर्ष थी, उन्होंने अविस्मरणीय वीरता का प्रदर्शन किया था, किंतु मुगलों की अथाह सेना के सामने कैसे टीक पाते, सैनिक मुगलों की सेना को कत्ल करते जा रहे थे लेकिन संख्या कम नहीं हो रही थी। साहिबजादा अजीत सिंह को शहीद होते देख छोटे भाई साहिबज़ादा जुझार सिंह ने भी अपने पिता गुरू गोविन्द सिंह जी से रणक्षेत्र में जाने की आज्ञा माँगी। गुरू गोविन्द सिंह जी ने उसकी पीठ थपथपाई और अपने छोटे पुत्र को युद्ध क्षेत्र में चार अन्य सैनिकों के साथ भेजा। गुरु गोविंद सिंह जी अपने पुत्र जुझार सिंघ को युद्ध क्षेत्र में जूझते हुए देखकर प्रसन्नता से जयकार के ऊँचे स्वर में नारे बुलन्द करते हुए बोलने लगे "जो बोले, सो निहाल, सत् श्री अकाल"। जुझार सिंह शत्रु सेना के बीच घिर गये और मात्र 14 साल की उम्र में वीरता के जौहर दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उस दिन वर्षा अथवा बादलों के कारण साँझ जल्दी हो गई, वर्ष का सबसे छोटा दिन था, कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी, अन्धेरा होने के कारण युद्ध रूक गया।

गुरू गोविन्द सिंह साहब ने दोनों साहिबजादों को शहीद होते देखकर ईश्वर के समक्ष धन्यवाद देने के लिए प्रार्थना की और कहा की: "तेरा तुझ को सौंपते, क्या लागे मेरा"

गुरु गोविंद सिंह जी अपने बेटों और बाकी सिख सैनिकों में भेदभाव ना करते हुए सबको अपने बेटे के समान समझा था। ने इस बात की पुष्टि किस बात से होती है कि जिसके बाद गुरु ने जोर देकर कहा था कि उनके बेटे युद्ध में लड़ते हुए शहीद हुए और मुझे गर्व है कि मेरे हजारों बेटे "सिंह" थे। उन्होंने यह भी कहा कि औरंगजेब ने कुरान की कसम खाने के बाद भी मेरे साथ धोखा किया है और भविष्य में कभी उस पर भरोसा नहीं करूंगा। 

ज़फरनामा

ज़फरनामा या "विजय का पत्र" एक पत्र है जो गुरु गोबिंद सिंह द्वारा तत्कालीन मुगल सम्राट औरंगजेब को लिखा गया था।  जफरनामा चमकौर में जो हुआ उसका स्पष्ट रूप से वर्णन करता है, और जो कुछ हुआ और जो वादे उसने तोड़े, उसके लिए औरंगजेब को भी जिम्मेदार ठहराया।

चमकौर से निकल भागने के बाद, थके हुए गुरु को दो पठानों (गनी खान और नबी खान) द्वारा जटपुर ले जाया गया जहां स्थानीय मुस्लिम सरदार ने उनका स्वागत किया। चमकौर के बाद गुरु गोविंद सिंह जी दीना जाकर माई देसन जी के घर में रहे, जहां उन्होंने 111 छंदों में फारसी में "जफरनामा" की रचना की।

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